केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें विधानसभा से पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दे सकतीं, भले ही वे उन्हें मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानती हों।
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की गैरमौजूदगी में चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष रखी। इस पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर शामिल थे।
राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी राय
सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है कि क्या राज्य सरकारें अनुच्छेद 32 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसलों को अदालत में चुनौती दे सकती हैं? साथ ही यह भी पूछा गया है कि अनुच्छेद 361, जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को न्यायिक जवाबदेही से छूट देता है, उसका दायरा क्या है?
तर्क: राज्य सरकारों के पास मौलिक अधिकार नहीं
मेहता ने संविधान पीठ को बताया कि अनुच्छेद 32 सिर्फ उन व्यक्तियों या संस्थाओं के लिए है, जिनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ हो। जबकि राज्य सरकार खुद कोई मौलिक अधिकार नहीं रखती, बल्कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए है। ऐसे में वह यह दावा नहीं कर सकती कि राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसलों ने उसके अधिकारों का उल्लंघन किया है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल 2024 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस समय कोर्ट ने कहा था कि अगर राज्यपाल विधेयकों पर तय समय में फैसला नहीं लेते तो राज्य सरकार सीधे सुप्रीम कोर्ट आ सकती है। हालांकि अब राष्ट्रपति चाहती हैं कि इस पर अदालत की स्पष्ट और ठोस राय दी जाए ताकि भविष्य में भ्रम की स्थिति न बने।
सीजेआई की टिप्पणी: विधेयक छह महीने लंबित रखना उचित नहीं
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि वह 8 अप्रैल के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, लेकिन यह जरूर जोड़ा कि राज्यपाल का किसी विधेयक को छह महीने तक लंबित रखना उचित नहीं है।
जब मेहता ने कहा कि एक संवैधानिक संस्था के निष्क्रिय होने पर कोर्ट दूसरी संस्था को आदेश नहीं दे सकता, तो इस पर सीजेआई ने जवाब में पूछा, “अगर सुप्रीम कोर्ट ही कोई मामला 10 साल तक लंबित रखे, तो क्या राष्ट्रपति को हमें आदेश देने का अधिकार होगा?”
कोर्ट का सवाल: राज्यपाल की शक्ति से बजट भी अटक सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने 26 अगस्त को यह भी सवाल उठाया कि अगर कोई राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चितकाल तक फैसला नहीं लेता, तो क्या अदालत के पास कोई रास्ता नहीं रहेगा? क्या राज्यपाल की स्वतंत्र शक्ति के कारण बजट जैसे अहम विधेयक भी अटक सकते हैं?
भाजपा शासित कुछ राज्यों ने कोर्ट में कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधेयकों पर फैसला लेने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए और यह निर्णय न्यायपालिका के दायरे से बाहर है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट इस समय राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संवैधानिक संदर्भ पर सुनवाई कर रही है, जिसमें पूछा गया है कि क्या अदालत राष्ट्रपति और राज्यपाल को यह निर्देश दे सकती है कि वे विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर तय समय के भीतर निर्णय लें। इस अहम मामले की अगली सुनवाई जल्द तय की जाएगी।